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हृदय हिमालय राखब तँ दु:खे
दुःख हयत
गंगे यमुना भ' क' बहैत रही भरि
पृथ्वी।
*
सुदिन छल प्राण अपना हाथ मे
छल
सभटा शुभ सुन्दर संसारक
माथ मे छल।
*
अनेरे डगडगा गेल आंँखि,
कुटकुटाय लागल।
किए लगैए ककरो नामक चर्चा
धुआंँ जकाँ।
*
कोय किछुओ कहय मुदा तैयो
आहाँ
स्नेह पर नहिं करब संदेह
कथमपि।
*
आब एहनो एतेक अन्हारो मे
कोन इजोत जे डराय नै दैए।
✨ गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
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