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चमन को मंज़िले अव्वल*
बनाने पे हैं आमादा
मगर हम मुत्मइन हैं नहीं होने
देंगे ये गुलशन ।
* क़ब्र,श्मशान।
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ज़ेह्न भी आता है सुस्ताने य'
आख़िर दिल के घर
रूह से छूटे नहीं ये शाइरी
रखियेगा ध्यान।
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बज़्म से उठ कर के हम ऐ दोस्त
आ तो गए लेकिन
छोड़ कर तो आ गये सब वहीं
जो लाने गये थे।
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जितना रूखा-सूखा रस्ता
मुश्किल जितनी मंज़िल थी।
कहाँ कहीं सुस्ताये,की पर्वाह
पांँव के छालों की।
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इस तरफ़ बैठा डरा जो सोचता
रह गया होता
ये तो उसने धकेला,दरिया में
आया तैरना।
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जी जलता है जनता का अपने
तलबों के ताप से।
देश झुलसता रहता है कुछ
नेताओं के पाप से।
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सफ़र में याद करके साथ इक
माचिस भी रखते हैं।
अगर्चे भाँग,बीड़ी ना तो हम
सिगरेट पीते हैं !
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जितना रूखा-सूखा रस्ता
मुश्किल जितनी मंज़िल थी।
कहाँ कहीं सुस्ताये,की पर्वाह
पांँव के छालों की।
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गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
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