हासिल प्रेम

 🌩️       हासिल प्रेम !
     प्रेम हमरा निर्भय आ साहसी
     बना देलक।
     एकहि काल भीड़ि गेलौं
     केहन-केहन मोंछ वला बंदूक
    आ तेल पिआओल लाठी वला
    लठिधर संँ निर्धोख-असकर।
    भीड़ि गेलौं ।
    से प्रेम हमरा केहन भीरु आ 
   अब्बल बना देलक
   एक रती नोरायल आँखि नै
   सहल भेल ककरो। जकर
   नामो गाम नहिं बूझल रहय
   तकरो ।
     ओ किछु शब्दो ने बाजल आ
     हम बेबस आंँखिक अपने प्रेमक
    मरुथल दिस भ’ चलि जाइत
    रहलौं।
     ताही मे चलैत,ठाढ़ छी
    कोनो वसन्तक बाट तकैत छी।
    बड़ दिव छी । धैर्य मे से गदहा
    बना देल'कए। आब अपन पीठ
    पर भरि सृष्टिक सबरंग-गंध-
    रसक सुखाएल फूलक मोटा
   अछि। झोरा मे थल्ही लागल 
   भविष्णु फलक गाछ रौद मे
   मौलयबा सँ बचयबाक अछि,
   ई नहिं पता जे ई मोटा लदने घर
   जा रहल छी वा घाट वा कत'
  भेटत से, चारि हाथ भूमि जतय
  रोपि जाइ गाछ !
  चलि रहल छी।
  रौदीक समस्त लक्षण समेत
  बाटक दुनू कात आक्षितिज
पसरल सुखायल खेत-पथार छैक।
    गाछक कोनो छाहरि तर  
   बैसल-बैसल तथापि,
     पाजु नहि क’ रहल छी।

       प्रेम मे जे ई नहि भेल
    भरिसक सैह कएलक प्रेम ?
                   🌿
      गुंजन g. 1ली मइ, 2016. 

           #उचितवक्ताडेस्क।

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