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बटेदार थिक आजुक साहित्यकार
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साहित्य वैह थीक जेना कोनो
बटेदार अपन श्रम,पूजी,
संलग्नता आ समर्पण सँग खेती
करैए आ अन्न उपजा क' खेतक
मालिक कें बाँटि दैत छैक।पूरा
उपजा ओकर नहिं होइत छैक।
कोनो लेखकक साहित्य सेहो
तहिना,लोक-समाजक सम्पत्ति
भ' जाइत छैक।
बटेदार कें बखाड़ी नै रहैत
छैक। बखाड़ी वला बटेदार परोक्ष
रूपक मालिके बनि जाइए
कालान्तर मे। साहित्यकार बेसी
सँ बेसी बटेदार भ' सकैत अछि।
। दोसर।
प्राचीन साहित्य आ साहित्यकार
साहित्य तेहन खेतीक उपज
थीक जे लेखक अपना लय नहिं
अपितु लोक समाज लय करैत
रहथि। लेखक तें कृषक थीक।
ओकरा अपन बखारी नहिं रहैत
छलैक।मोटा-मोटी साहित्य आ
साहित्यकारक सम्बन्ध केँ एहने
बुझल जाइत छल। हमरा जनैत
समस्त प्राचीन शास्त्र आ ज्ञान
सैह थीक।
प्राकृतिक परिवर्तने जकाँ
समाज,साहित्य,पर्यावरण तथा
लेखकक प्रवृत्ति मे परिवर्तन
सेहो प्रकृतिक अपरिहार्यता थिकै।
साहित्यक उत्तरोत्तर अत्याधुनिक
परिस्थिति तकरे परिणति
बुझबाक चाही।
गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
सात अगस्त,'२२.
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