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ग़ज़लसन
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मालिक रही कि आहाँ मुख्तार रही बाउ रही करी मनुक्खे भेल ठार रही बाउ।
कतबो भेलय अतत्तह केहनो सवाल हो जनते रही न कथमपि सरकार रही बाउ।
केहनो न रहओ स्वर्णकाल दस्तावेजी हँ कालक सन्दूकक रखबार रही बाउ।
हो बात आर ऊँच बनि क' रही किनार
मझधार मे तँ नाओक पतवार रही बाउ।
फ'री भने से नेबो, लताम, आम जे रोगीक वास्ते धरि अनार रही बाउ।
रहबाक लोक हो आ करबेक लोक काज बैसक रहय दलान, न दरबार रही बाउ।
•• गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क। २१सितं.'२२
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