• ग़ज़लसन •
दुःख जगबैए गबबैए
सुख मोहैए सुतबैए।
सृष्टिक इहो परीक्षे थिक
पढ़ियौ ने जे की कहैए।
प्रकृति छोड़ि आन सभ क्यो
भरि जीवन दोहरबैए।
धनिकक डांँगक लागल चोट
गरीब लोक सोहरबैए।
सरकारो सरकारे थिक
आश्वासन सँ बहलबैए।
राजनीति तँ ऊपर सँ
आन्हर स्वप्न देख'बैए।
|🔥|
गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें