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' हमर प्रेम '
हमर प्रेम
कहियो अचार नहि छल
-चहटगर स्वादक !
नहि भेल से।
कोनो दुर्लभ प्रेय पारिजाते रहय
तखनहुँ,जखन रही
कड़ाचूर जुआन !
तथापि नहि रहय से हमर
आकाश कुसुम जकर सौरभ,
मात्र पोथी,कथा-पुराणें टा मे
भेटय !
हमर प्रेमक सुगन्धि कतोक-
कतोक शहनाज़ हुसैनक समस्त
शृंगार प्रसाधन उपादानक भरल
भण्डारक कृत्रिम सौन्दर्यक
उत्कट अत्तर-फुलेल सँ ऊपर
विचरय छलय - मेघोन्मुख उठैत
हमर हिड़लाक आस ! जे,
हमर पीठ पर बर्तन-बासन करैत
आलता धोआयल एकटा गोर,
खरखर कोमल तरहत्थी सँ गबैत
हाथक गीत विन्यास छल ।
जीविका लेल फिफिआइत डेग
सँ उड़ैत हमरे प्रेमक रंग-सुरभित
धूरा सँ खेलाइत छल धुरखेल,
उन्मत्त गबैत छल फागु,
फागुनक बसात !
भोर सँ साँझ धरि एक साधारण
लोक जकाँ जीयै लेल
नाना उद्यम मे फिरीसान-
हलकान
हमर प्राण !
ताही मे निश्चिन्त रहय सदिखन
हमर बिनु नहाएल,
कल्हुके पेटीकोट-साड़ी-ब्लाउज
उड़िआइत केशकाया मे हमर
प्रेम-स्वच्छ धवल !
एक असोरा इजोरिया मे भरि
ब्रह्माण्ड करैत चन्द्रमा।
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गंगेश गुंजन, #उचितवक्ताडेस्क। पुनर्प्रस्तुति: २३.११.'२२.
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