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मीत मन कखन रहैए !
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कौखन कविता-नवकविता सन
कौखन गीत रहैए
व्यथा-कथाक नोर,बिहुंँसी मन
कौखन मीत रहैए,
कनफुसकी करैत रहैए।
लोकक दुख सँ आहत कौखन
क्रोधित सिन्धुक ज्वारि
कौखन गंग-जमुन सरस्वति सन
संगम प्रीत रहैए,
मन मे बहैत रहैए।
केहनो बिपति रह' प्राण पाथर
केने रहि जाएबे
कौखन ऊँच शिखर पर्वत संँ
निर्झर नृत्त रहैए,
उज्ज्वल झरैत रहैए।
सद्य: खेत सँ काटल कौखन
टटका कुसियारक पोर
कौखन बिनु आमिल अध सिज्झू
करइल तीत रहैए
स्वाद कें मीठ करैत रहैए।
बोलय बिहुंँसय ई बसन्त एकसरो
अपन मने थिक
विकट वर्तमान रौदी पर कखनो
पावस गीत रहैए,
गुन गुन गबैत रहैए।
रूसि गेली कमला घुरि क' नहिं
अयली कहियो इ गाम
तें की एखनो हृदय धार केर,
मिथिला प्रीति बहैए,
देस हित लीखब कहबबैए।
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गंगेश गुंजन, #उचितवक्ताडेस्क। संवर्धित टेक्स्ट
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