...कौखन मीत रहैए !

🌺|🌺
        मीत मन कखन रहैए !
                  🌿🌿
  कौखन कविता-नवकविता सन
कौखन गीत रहैए
  व्यथा-कथाक नोर,बिहुंँसी मन
कौखन मीत रहैए, 
      कनफुसकी करैत रहैए। 
    
  लोकक दुख सँ आहत कौखन
क्रोधित सिन्धुक ज्वारि
  कौखन गंग-जमुन सरस्वति सन
संगम प्रीत रहैए,
         मन मे बहैत रहैए।

  केहनो बिपति रह' प्राण पाथर
केने रहि जाएबे
  कौखन ऊँच शिखर पर्वत संँ
निर्झर नृत्त रहैए,
         उज्ज्वल झरैत रहैए।

  सद्य: खेत सँ काटल कौखन
टटका कुसियारक पोर
  कौखन बिनु आमिल अध सिज्झू
करइल तीत रहैए
       स्वाद कें मीठ करैत रहैए।

  बोलय बिहुंँसय ई बसन्त एकसरो
अपन मने थिक
  विकट वर्तमान रौदी पर कखनो
पावस गीत रहैए,
         गुन गुन गबैत रहैए।

  रूसि गेली कमला घुरि क' नहिं 
अयली कहियो इ गाम
  तें की एखनो हृदय धार केर,
मिथिला प्रीति बहैए,
      देस हित लीखब कहबबैए।
                     •
               गंगेश गुंजन,                                    #उचितवक्ताडेस्क। संवर्धित टेक्स्ट


टिप्पणियाँ