शब्दक आयु

              शब्दक आयु 
  शब्दक आयुर्दा 
  लोक-मुखक प्रयोजने धरि रहैत 
  छैक। तहिना भाषाक सेहो। खेतो 
  पथार आ धन-वित्तक।
  आब तँ खेतीए कम। ताहू मे  
  धानक उपजा। तहिया बड़ यत्न
 सँ बनाओल बीया जोगबैक उपाय
 रहैक-मोढ़ि। 
 आब जखन धाने अपन नव-नव
 प्रजातिक अवतार मे अगहन पर
 आश्रित नहिं रहल तँ
 व्यक्तिगत रूपें बीया-बालिक
 संरक्षण सेहो प्रसंग सँ बाहर भ'
 गेल। 
  समस्त बीया बजारक अधीन
 चलि गेल। 
  कोन ठेकान कोल्ड स्टोरेज वा
 कतहु राखल जाइत हो। 
  मोढ़ि किएक बनओ तें,आइ एहि शब्दक अनुसंधान कर' पड़ल-
'से की छलैक जे बीआ राखल
 जाइक एकछोहा धानक
 बीछि-बीछि क' ?
 धन्य जे सरिता जी सद्य: मोन पाड़ि
 देलनि -'मोढ़ि!'
 पैघ खरिहान संगे बखारी सेहो तँ
 विलुप्त भेल। मुदा कहाँ बाँटल गेल
 सभ धान-गहूम
भूख व्याकुल लोक सभ मे?
 से तंँ नव अवतार मे  
 नगर-महानगरक
 निजी बैंक सभ मे उपजैत रहल।
  बेस की भेल ,
  बखारी चलि गेल।
  कम बेसी बाधक खेत बाँचल अछि, किंचित,देखा चाही कतेक
 दिन। 
  राष्ट्रीय उन्नतिक उन्माद निरन्तर 
  गीड़ैत जा रहल अछि जलकर
  उपजैत खेत।
  दहा क' ल' जा रहलय नेशनल 
  हाईवे'क वेगवान प्रवाह !
  ई समस्त प्रगतिक तैयारी मनुष्यक 
  जीवनक थीक कि युद्धक?
      अपने के,
          अहाँ,ककरो 
               बूझल अछि ?
                      ••
               गंगेश गुंजन,
               २०.११.'२२.                                     #उचितवक्ताडेस्क।

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