जीह लय जीअब नियति थिक : गज़लसन

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जीह लय जीअब नियति थिक,नेत नहिं
स्वाद जीवन मनुष्यक अभिप्रेत नहिं।

काव्य लीखब थिक न धनकटनी कोनो      काव्य एहिना कोनो उस्सर खेत नहिं।

 पितृ-धन सन शब्द छुट्टा ख़र्च लय
 कोश अक्षर,शब्द तें  से  देत नहिं।

ज'ल अमृतहो भने जबकल सरोवर 
हो ने कविता ज'ल मे यदि रेत नहिं। 

 लेखकक प्रारब्ध भोगब दुःख टा
 चैन ई संसार कहियो देत नहिं।
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          गंगेश गुंजन, ३०.११.'२२.                         #उचितवक्ताडेस्क।

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