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कहलासँ सम्हरि जायतँ कहिदेब उचितहयत से नहिं तँ आन क्षण लय चुप रहब उचित हयत
कतबो यतन करब तँ सब संग नहिं चलत
हँ प्राण लगा दी तँ किछु लोक क्वचितहयत।
बेसी कला कि कविता कि दर्शन विज्ञान
युगधार के ख़िलाफ़े किछु खास रचितहयत।
जारनि जेहन सुखायल हो आँच हो कड़ा
भ' जायत सिद्ध अन्न,भानसो त्वरित हयत।
रहिये गेलौं चुप्पे भ' एहनो दुनियाँ मे
ऐ सँ अधिक हृदय की ई,परजरित हयत।
निश्चिंत सबहि लोक रहैए कोना एनासोचै छी कखन सब लय,सब लोक व्यथित हयत।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
१२.१२.'२२
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