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इहो क' लेब हम ओहो हमहीं क' लेब
हमर स्वभावे कोनो बातक जिद ध' लेब।
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स्नेह सँ कहने छल ओ एक बेर निहुँरि गेलौं
कोनो बेमोन कहब पर तँ पर्वत भ' लेब।
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एक नहिं कय-बेर सोचब उपकारक पूर्व
आओत क्यो किछु देब' आ हम ल' लेब ।
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सैंति क' जीह कें रखलौं भरि जीवन तेँ जे
देह कें,आफद मे सभ चोट सहन क' लेब।
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हँ मुदा सुन्दर संसारक जे स्वप्न हमर
दिअय बदला तकर स्वर्गो क्यो,हम ल' लेब।
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गंगेश गुंजन
१५ दिसंबर,२०२२.
#उचितवक्ताडेस्क।
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