ग़ज़लनुमा 🌿👣🌿
अपना वही नगर होता
वो ही कच्चा घर होता।
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हासिल क्या है इस युग का
जीना यूँ न ज़हर होता।
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आस पास थे सब अपने
रहते दुःख में गर होता।
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खिंची बड़ी लम्बी ये रात
अब ये ख़त्म सफ़र होता।
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होती कविता भी आज़ाद
इन्सान मुक्त बहर होता।
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गंगेश गुंजन
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