🌿 सप्तपर्णी ....
जाइत काल बाट मे देखबनि कनी हुनको चलि गेलनिहें छोड़िक' बाटे मे अपन लोक।
बैसल होथि थाकि क' कोनो गाछ तर कतहु
बैसि रहबनि एकरती बिलमिक' हुनको लग।
-२-
क्रान्तिवीर कवि लोकनिक इ ढब तँ देखू। आगिक अक्षर लीखि रहल छथि काग़त पर। -३-
गनि रहल अछि समय सबटा गारि अहाँक
सहत बस निन्नानबे धरि काल थिक कृष्ण।
-४-
कोन सौंस सुक्खक आशा मे बौआ क'
पूरा जीवन क' लेलहुंँ हम मृगतृष्णा।
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ओ एकसर अछि ओहो एकसर
सब एकसर अछि हमहूँ एकसर।
-६-
आब कहांँ बाँचल प्रतीक्षा कें बेर
फूल मुरुझल,सूर्य डुमला,सांँझ भेल।
-७-
प्राण व्याकुल अछि कतेक एकसर छी
कोनो मुद्दैये भने, लऽग मे रहितय।
🌺🍀🌺
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क। ३१दिसं.२०२२.
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