👣 अकस्मात कखनो
कोनो दिन कविता बलात् निकाल' पड़ैत छैक कवि कें, महाभारत पर्यंत। ऋतुक ताक ताहरी पर गृहस्थ तोड़ै-खोलैए-निकालैए जोगाओल धान बीयाक मोढ़ि ।
युद्धरत दुर्लभ विश्राम काल मे सैनिक
आसन्न आक्रमण पर अकस्मात्
उठा लैए हथियार।
प्रच्छन्न युद्ध छोड़ि लोकतंत्र
आर किछु नहिं आइ।
जनता सेहो झोंकायल अछि -
एहि बेर महाभारत मे
रिक्त हस्त,निरीह।
ग्लोबल भेल अछि
कुरुक्षेत्र रणभूमि !
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गंगेश गुंजन,
२०.११.'२२. #उचितवक्ताडेस्क।
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