पढ़िया नूआ; स्त्री !

 🌀           पढ़िया नूआ : स्त्री

  सूत-सूत मसकि जाइत
अछि-नूआ,
  ओकर पाढ़ि नहिं फटैत छैक,
द’ढ़े रहैत छैक-स्त्रीक भरोस आ
उमेद
  पुरुषक फटलाहा झोराक डंँटी बनै
लेल।
  गाम संँ दूरस्थ अन्हरिया रातिक
बाधमे                                                   परोड़क खेत ओगरय काल पुरुषक
कान्ह-काँख सँ लटकल-सात
बैटरी वला बड़का लाइटक फीता
बनल रहैए- भयाओन गुज्ज चतरल   अन्हार मे,
आगांँ-पाछांँ चारू कात बड़ी-बड़ी
दूर धरि फोकस मारैत
      इजोतक उघना बनैए।
नैहर-सासुरक बीच अपन
दुर्लभ सौभाग्यक यात्रा मे
बिछाओनक मोटरी बन्हबा लेल
द’ढ़ रहैए।
नूआ होइतहुंँ नूआ संँ फराक
कतेक पकिया मजगूत रहैए ?
पुरुखक अनन्त लिप्साक शिकार
होयबा धरि,अपने पढ़िआ नूआक
ओही सुन्दर आ मजगूत पाढ़िक
ससरफानी संँ गर्दनि मोकाइत,
मृत्यु संँ बन्हाइत काल धरि स्त्री।   
     तथापि कोना भरि जन्म    
उमेद बनल रहैए- ई !
                        🎋
                 गंगेश गुंजन।                                      #उचितवक्ताडेस्क। 

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