निकलब तँ जरूर... कविता:

 🌀            । निकलब तंँ जरूर ।

हमरा बूझल अछि
जखने हम निकल’ लागब
अहाँ हमर बाट छेक लेब।
हमर क्षोभ,असंतोष सभटा
असुविधाक
तत्काल निराकरण क’ देबाक
प्रतिज्ञा करब,
भरोस देब। संभव जे तखनहि
हमरा चमचम उमेदक फुदना वाला
गरदामी‌ पहिरा देब।
सुन्दर सुन्दर कौड़ीक पद्म‌माल
सेहो साजि क’ हमरा समृद्ध क’
क’ तेना राखि देब जे असकर बाट
पर निकल’ मे हमरा भय होअ’
लागय।
किएक तं अहाँ के बूझल भ'
गेलय-
एहन समृद्ध भेल हम,जखने बाट
पर निकलब अहींक कोनो
कार्रवाइक सक्रिय शाखा सबटा
लूटि लेत।
आब कंँगाल भ’ नहि रहि हैत
हमरा
अहाँ के सेहो ने बूझल अछि।
हमरा अपन सुरक्षा कृपा द’ क’
अहांँ निश्चिंत छी।
  हम अहाँक सुरक्षाक
  जेल मे बंद भ’ गेल छी ।

  मुदा निकलब तं हम जरूरे।
  कोनो एक दिन,कोनो पहर हमरा
  अबस्से आनत सवारी
  हम तकर ओहार भ’ क’ निकलि
जायब।

  निकलब तंँ जरूरे
अहाँक एहि सुभीता-सम्मानक
जहल संँ दुरगमनियांँक विदाइक
खोंइछा में गोट सुपाड़ी-हरदि-
दूभि-धान भ’ क' वा ‌कोनो चंँगेरा
मे चिट्ठी भ’ सांँठल चलि जायब।
  निकलब तँ हम जरूर।
आखिर पोथीक पन्ना मे बसात तंँ
भ' जा ‌सकिते छी।
  निकलब तंँ जरूर अहाँक ऐ
  जेल संँ।
       जल्दीए कोनो दिन।
                    🪂 | 🪂
                  गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।                                      (पुनर्प्रस्तुति)

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