अपने मे समटल जे लोक
हकन अधिक कानत से लोक।
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भाषा मे हरदम 'हम हम'
'हमसब' नहिं बाजत से लोक।
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ज्ञान पड़ोसक नहिं पर्यन्त
भरि विश्वक छाँटत से लोक।
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पकड़ऽ नहि आबै तरुआरि
म्याने केँ भाँजत से लोक।
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बेर बिपत्तिक किछु नहिं बोध
तंबुक बड़ तानत से लोक।
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भूखल रहि न सकय एक साँझ
परिवर्तन आनत से लोक।
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राजनितिक बूझत के बोल
चीन्हत सन्धानत के लोक।
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भाषा,राज्यक आन्दोलन
नवे तूर ठानत से लोक।
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अपनो चीन्हू अपना कें
तखने गुंजन मानत लोक।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
ग़ज़ल सन।
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