🍂 कत' सँ आबि जाइत छनि
हुनकर कविता मे बसन्त?
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कत' सँ आबि जाइ छनि सुनकर
कविता मे फुलायल बसन्त
हुनका लग,वसन्त पंचमीए दिन ?
जेना तैयार बैसल होइन। विदा
करा क' ल' अबैत छथि।
कलम पर बैसा कऽ।
विस्मित छी -केहन से बसन्त छैक
जे एना निधोख आबि जाइत छनि
कलमक नीब पर, कविता मे, कविक भाषा मे !
ऐ कनकन समय मे राति हमरो
स'ख भेल जे,हमहूँ आनी कविता
मे ऋतु बसन्त !
नव पल्लव रंग विरंग फूल !
सुगंधि पसारैत वासन्ती रंग,बसात
प्रकाश।
एक टा डाली दैत कविता के
अढ़ौलिऐ-
'जो एहि मे फूल,रंग,सुगंध आ कोइलीक बोल ल' आनै ' अनमन जेना,गामक हरवाह बिदेसर
आठ बर्खक अपन बेटी के अढ़ा क' पठबै छैक बाध संँ हरियर घास गढ़ि क' आनऽ।
हमरो कविता उल्लसित भ' डाली
ल' क' गेल आन' लय बसन्त।
बड़ी काल भ' गेलै।
घूरलि तँ बहुत उदास छलि।
देखलिऐ -डाली मे पन्ना फाटल बाल-पोथी,अढ़ूल फूलक सुखायल डारि,कोनो पक्षीक भरिसक कोइलीक टूटल पाँखि,बिनु ठेपी अलताक शीशी,
माटि मे लेभरल फूटल लाल पीयर लाह चूड़ीक टुकड़ी। मोटहा चाउर आ किछु गहुमक दाना…
किंचित तामस करैत हम पुछलिऐ-
'तों ई सब की ल' अयलेंहें ?'
'वसन्त हमरा कत्तहु नहिं भेटल।'
कविता बाजल।
अपन तामस रोकैत कहलिऐ-
'कनिक आर आगाँ बढ़ि क' देखितहिक। भेटबे करितौ कतहु..।'
'ताक' लय आगाँ तंँ बढ़लिऐ…' ओ हिचकिचाइत बाजल।
'तखन ? किएक ने बढ़लें?' हम
जवाब तलब केलिऐ तँ ओ दुखी
भ' गेल।बाजल -
'तखने इस्कुलक घंटी टनटनाइत
सुनाय लागल आ देखाय लागल
-हेंजक हेंज विद्यार्थी। बस्ता
लेने,बजैत,गबैत दौड़ैत…
आ पुलकित बाबाक पोता
अनन्दा कें देखलिऐ बिस्ठी पहिरने
पिंडश्याम नग्न देहें,बाध सँ घुरैत,
घामे पसेने त'र माथ पर घासक
पथिया…।
मोन कोना दन कर' लागल।
आगाँ नहि गेल भेल।
रहलो होइ वसन्त कतहुंँ, तंँ रहौ…'
तखने संँ क्षुब्ध अछि
ठेहुन मे मुँह मोड़ने बैसल अछि।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क। २८जनवरी,२०२३.
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