सुनियौ, सपना ककरो

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          सुनियौ, ककरो सपना !
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  जे अपन स्वप्न सुनाबऽ चाहैए
  से ज़रूर सुनियौ।
  बिच्चे मे ओकर स्वप्न सुनब काटि
  कऽ
  अहाँ अपन सपना नहिं सुनाबऽ
  लगियौ। चोट लगैत छैक।
  जतेक दुःख मनुष्य कें बीच स्वप्न
  निन्न टुटबाक होइत छैक ओइ सँ
  बहुत बेसी
  ओकर स्वप्नक नहिं सुनल
जयबाक अवहेला सँ पहुंँचैत छैक।

  अपन सपना अवश्ये सुनाबी मुदा
से
  कोनो आन घड़ी खास मुहूर्त मे
  सुनयबाक हृदय राखी।

  एहन विकट एकसर काल मे
परस्पर
  स्वप्न कहै-सुनैक स्थान बाँचल
रहय समाज ओ लोकक आत्मा
मे,अपना मे
इहो कम नहि,समय
    बेसी काल
       नीके दिसि क' बदलैत छैक।                     
                  🌿🌸
              गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क। 

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