ग़ज़ल सन‌ : कहला सँ ने सुनला सँ

                   💥                                    ग़ज़लसन
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कहला सँ ने सुनला सँ जे किछु
हयत से बुझला सँ
डेग-डेग जे काँटक बोझ से ह'टत
जरौला सँ।

जहिया संँ चेतन भेलौं जखने सँ इ
बूझल भेल
लोकक चिन्ता संग स्वयं सुविधा
भेल बदलला सँ।

चलि जायत कि रहत मनुक्ख से तंँ
अछि अज्ञात तखन
देखी सम्प्रति रहिए क' की बदलैतछि    रहला सँ।

धन हो कि संसाधन कें जोगाजोगा
रखैत देखल
बड़ कम छल जे जतबे से सुख
भेटल बिलहला सँ।

बड़ पुरान हो राजनीति तंँ राजतंत्र
सन्हिया जाइछ
मेंही एहि व्यवस्थाक बोध बाँचत
जागल रहला सँ।
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                            गंगेश गुंजन                                 #उचितवक्ताडेस्क।

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