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ऐ अन्हार मे ड'र भ' गेलय
मन ई प्रेतक घ'र भ' गेलय।
क्यो आयल सब स्नेह चोरि क'
जिनगीए असकर द' गेलय।
बड़े यत्न सँ राखल छल,के
विश्वासक कंतोर ल' गेलय।
अपना सहिते पुरखोक कर्जा
चुकबय दस्तावेज द' गेलय।
काल्हि कते मधु आनन्दक रस
आइ केहन जहर द' गेलय।
हरियर पीयर ऋतु वसन्त ई
हमर म'न केँ की क' गेलय। 🍂
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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