अहाँक भूत : ललित वार्ता


               'अहाँक भूत'                                       (ललित वार्ता )                                              😉

फेसबुक पर एक परम मित्र अपन कवि मित्रक पुरान दू-पँतिया कविता पढ़ि कऽ उद्गार मे मित्र केँ लिखलथिन :

'अहांँक भूत कें देखि कऽ परम आनन्द भेल। '

' मुदा हम तंँ भूत-प्रेत मानै नै छी। अहाँ कहिया संँ मानऽ लगलौंहें?...ओहनहुँ हम तंँ जीवित छी।मुइलौंहें कहाँ एखन।' चकित भूत मित्र चोट्टहि जवाबलिखलथिन। 

'माफी दी मित्र।एक रती हरबड़ी मे' अहाँक 'भूत(काल) मे देखल' केर बदला, 'अहाँक भूत कें देखल' लिखना चलि गेल! आ एही दुआरे एक टा महा विपत्ति सेहो आबि तुलायल अछि हमरा पर। पाँच बर्खक हमर दौहित्र भारी जिद्द ठानि देलकए -

 'नाना जी,हमहूँ भूत देखब,हमरो भूत देखा दिअऽ।' ताहू संँ भारी विपत्ति भऽ गेलय। भेलए ई जे हम बालबोध कें बुझबै मे लागल रही जे 'भूत-प्रेत' किछु नै होइत छैक। भूत प्रेत फूसि बात छैक। कि नातिक ममता सँ व्याकुल नानी अहांँक- मित्राणि बीचहि मे फज्झतिक तऽर कऽ देलनिहें-

'एना भऽ कऽ नेना कहि रहलए तंँ, भूत देखा ने दिऔक एक रती। सत्ते केहन निसोख भेल जाइ छी अहूँ दिन-दिन।'

       से एहना परिस्थिति मे मित्रवर, अहांँकें दुइयो घंटा लेल दिल्ली संँ सहरसा आएब आब जरूरी अछि। सेहो पवन वेग संँ आयब जरूरी। कारण जे नानीक कोरा मे नाति हाथ-पयर पटकैत फकसियारी द' रहल छनि - 'नाना नै देखबै छथि भूत। नाऽऽनी ऽ ऽ, अहीं हमरा भूत देखा दिअ।'

    एहि मैसेज कें तार बूझब। पहिले ट्रेन पकड़बाक ब्यौंत करब। सहरसा धरि हवाइ जहाज नहिं भेलय तेँ। अन्यथा सैह पकड़ि क' आब' कहितौं।  

   अहांँक पहुँचब प्राण रक्षक जरूरी अछि।

                        *

                                      प्रतिष्ठा मे,

    मित्र योगानन्द हीरा जी,सहरसा वासी।

                          सस्नेह, गंगेश गुंजन 

                #उचितवक्ताडेस्क।                                    पुनर्प्रेषित पोस्ट 


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