चौबटिया नाकट : पेट्रोल डीजल सँस्कृति

[ चौबटिया नाटक ]

            'पेट्रोल-डीजल संस्कृति'

(दैनंदिनक कोनो सामान्य मैथिल बैसकीक दलान दृश्य)।

लोक-१ : आब संस्कृतियहुँ मे पेट्रोल-डिजिलक 

         गंध लगैए।’

  (एक टा तेजस्वी युवक अकस्मात् टिपलथिन।  

लोक-२ : तखन तँ तरल तिलकोर मे सेहो पेट्रोल- डिजिलक गंध लगैत हयत ?'

     (ई जे महोदय टोकलथिन। वयस-बगाय सँ 

       अधेड़- ५०-५५ क बुझाइत छथि।)  

लोक-१ : हँ यौ। यदि तिलकोड़े संपूर्ण मैथिल संँस्कृति बूझी तँ। (बिहुँसैत कहलथिन।).     

लोक-२ : पान-मखान सँ ? (व्यंग्यक स्वर आ चुनौती दैत भंगिमा मे)

लोक-१ : पान-मखान सँ ? पाग-डोपटा पर्यन्त 

            सँ तँ।

      ( बिहुँसैत। हुनको सँ तीक्ष्ण व्यंग्यक स्वर 

      आ भंगिमामे अपन शब्द आ स्वर केँ 

       रेघबैत जकाँ)

लोक-२ : अहीं सन-सन लोक पूरा मैथिली संस्कृति केँ चौपट्ट क’ देल। सर्वस्व स्वाहा क’ देल। (अपन  कप्पार पिटैत जकाँ।)

   (ओही ठाम एक टा अपेक्षाकृत बेसी संभ्रांत 

   बुझाइत व्यक्ति अख़बार पढ़बा मे व्यस्त । मुदा भाव-भंगिमा सँ आभास होइत अछि जेना कान एही मे लागल होइन। वार्ता केँ अकानि रहल होइथ। अखबार मोड़ैत हिनका लोकनि दिसि मूड़ी घुरबैत पहिल व्यक्ति केँ कन्हुआइत आँखिये देखैत,परोक्ष धिक्कार भाव आ स्वर मे कहैत छथिन :) 

लोक-३ : औ युवक ! तखन तँ अहाँकेँ अत्तर  

      आ आधुनिक डीयोडेंट इत्यादि मे सेहो

  पेट्रोल-डिजिलक गन्ध अबैत हैत ?' 

( युवक ओहि सभ्रान्त प्रौढ़ मैथिल कें संयत परन्तु आग्नेय नेत्र सं देखैत जवाब दैत छथिन-)

लोक-१ : हम अपना मैथिल लोकक यथार्थ कहि रहल छी सर ! अपनेक नहि ।

       (युवकक उपेक्षा भाव केँ बुझैत,ओ व्यक्ति

      तीक्ष्ण प्रतिक्रियाक स्वर सँ)  

लोक-३ : अर्थात् ?  हम मैथिल नहि छी अहाँ

       वास्ते ?'

 (हुनक भौंह चढ़ल छनि। युवक ओहने तीक्ष्ण आँखिये हुनका देखैत संयत तामसक स्वर मे :)


लोक-१ : जी नै। अपने अंग्रेज़ मैथिल थिकहुँ।

             वा नवका अमेरिकी मैथिल सेहो भ’ 

          सकैत छी.नवका चलनि मे कारपोरेट 

           मैथिल !

लोक-३ : हम अंग्रेज़ मैथिल थिकहुँ। ई कोन 

            मैथिल भेलै ? हम मैथिले ने बुझाइ 

             छी अहाँकेँ ?  

       (ओ अपमानित अनुभव करैत सन 

        विचलित मुखाकृति मे)

लोक-१ : निट्ठाहे नै. मिथिला मे साधारण लोक 

            कोना रहि रहलय,जीवि रहलय तकर 

            स्वाद अपने केँ नै बुझल अछि।'

लोक-३ : की बात क’ रहल छी औ ? हमरा अपन मांँ मिथिला अपन जन्मभूमिक अनुभवे नहि अछि ? साठिम वयस पार क’ चुकल छी आ हमरा मिथिला बुझले ने अछि!'

       ( ओ परम क्षुब्ध आ तमसायल छलथिन.)

लोक-१ : जी हँ .कहाँ सँ बुझल हैत ? अपने लोकनिक मिथिलो तँ फराके अछि ने. गुलाम देश भारत मे तहिया बड़का लोक भ’ क’- गाम मे जमींदार आ पाँजि-पाठि वला किछु बड़का परिवार भ' क' रहलियै। आब स्वतंत्र देशक मिथिला मे मिथिलाक सुख संपन्न राजनेता आ एन.आर. आइ. बनि गेलियैए .(हुनकर चुटकी लैत जकाँ )


लोक-३ 

    (आओर क्रोधित होइत कनी उच्चस्वर मे )

    : अहाँ तँ हमरा बहुत भारी उग्रवादी युबक 

    बुझाइत छी यौ। आदिकाल सँ चलि आबि 

    रहल अपन सांतिप्रिय मैथिल समाज केँ 

    अहाँ तँ तोड़ि-ताड़ि क’ राखि देनिहार उद्द्ण्ड 

     प्रचण्ड बुझा रहल छी !'    

लोक-१ : हमरा बुझल छल।अपने सैह सब किछु कहबै। तैयो रच्छ जे अपने हमरा आतंकवादी -अलगावबादी नै कहलौं।  

नबका महराज !'

   ( दुनू हाथ जोड़ि अपन कपार पर रखैत  प्रणामक मुद्रा में): 

     गेल जाओ। डायनिंग टेबुल पर चिकेन बिरियानी सेराइत हैत।

  ( युवक पर ओ सज्जन मार-मार क’ छूटै छथिन। युवक नाटकीयता सँ हँसैत दोसर दिसि घसकि जाइत छथि। नवतुरिया बहुल उपस्थित लोक में अधिकांश खूब जोर सँ हँसैत छथि। एक टा प्रौढ़ व्यक्ति ठाढ़ किछु क्षण सोचैत जकाँ सब सँ पाछाँ धीरे-धीरे दृश्य सँ बहराइत देखाइत छथि।         

 पृष्ठभूमि सं एकल स्वर :नचारीक सुनाइत अछि।

                      .....                                          #उचितवक्ताडेस्क।                           -गंगेश गुंजन। २१.११.'१९.


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