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फेसबुक पर किछु गोटय माछी स्वभावक बुझाइ छथि।
कय टा तुरन्ता टिप्पणी पढ़ि कऽ तँ सद्य: लगैत छैक। से लोक मिश्रीक ढेप पर नहिं बैसताह/बैसतीह,घाओक पीजु पर जा क' बैसताह/ बैसतीह।
एहन दुष्कालमे मनुक्खक संवेदनशीलता सेहो अनेरे तीख आ कटु नहिं रहबाक चाहीहल्लुक-फुल्लुक प्रीतिकर किछु लिखी- पढ़ी से चेतना भावना रहयतँ बेसी लौकिक आ उत्तम।
विशुद्ध मैथिली मनोविनोदी किन्तु सार्थक गपशप दरकार।
!😁!
#उचितवक्ताडेस्क।
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