कवि ने ओकील ने जज होइए
कविता यदि अछि तँ विधायिका भ' सकैए। न्यायपालिका तँ कथमपि नहिं। जे कविता कोनो न्यायाधीश जकाँ निष्कर्ष ओ व्यवस्थाक बोल बजैए तकरा हम कविता नहिं मानब।
कय टा तथाकथित कविता मे कवि कि तँ ओकालति करैत बुझाइ छथि वा न्यायिक व्यवस्था दैत। गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।२जून,२०२३.
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