🍄 मनोरथ आ लोक
विडंबना अछि जे
जीवन मे बेसी काल मनुष्य
अपने मनोरथ सभक त'र मे दबा क' प्राण द' दैए।
दोसर दिस,
मनोरथ नहिं रहय तँ
निर्धन सँ ल' क',जे सब तरहें असहाय लोक होइत अछि सेहो
जीवि नहिं सकय।
सेहन्ता नहिं,मनोरथ।
से धुक-धुक करैत मनुखक अंतिम श्वाँस धरि रहिए जाइत छैक मन मे
मनोरथ'क महल
आब ढहल त'ब ढहल।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ता डेस्क।
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