🏡
लोकोचित नहिं भावुकताक निरादर !
*
एहि फेसबुक दलान पर त्रिकाल दै वला सेहो पर्याप्त बैसल रहैत छथि।एहन लोकक भावुकताक बाढ़ि सँ अगुताइ नहिं जाइ। दहा नहिं जाइ जाय। बाढ़ि मे कतोक छोट-पैघ मृत जानवर संगे कय बेर मनुष्योक लहास दहाइत देखाएत। मुदा ताहि संगे किछु पैघ गाछ-वृक्ष सेहो। गाछ केँ तंँ राखि लेबाक उपाय करबाक चाही। कारण जे ओकर स्वामीक अता पता नहिं। ओ तंँ सर्वथा अनेरुआ।
से गाछ रौद मे सुखा क' राखि ली तँ जाड़ मास वा कखनो जाड़निक काज आबि जायत। यदि ओ काठ बेसी ठीक-ठाक रहल तखन तँ अओरो उपयोगी काज भ' जायत।ओइ सँ दलानक बैसकी लय ब्रेंच बनि जा सकए।
भावुकताक ओहन भसियाएल टिप्पणी कें निरादर वा विरक्ति संँ नहिं अपितु समवेदनासँ पढ़ि लेबाक चाही।
धैर्य एखनहुँ मनुष्यक ओतवे विशेष ध'न होइत अछि। बल्कि एहन निष्ठुर लोक-समाजक युग मे तँ आर बेसी आवश्यक।
📔
#उचितवक्ताडेस्क।
२३ जून,'२३
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें