ग़ज़लसन !
किछु दिन तँ गल्ती पर बड़ पछतयलौं हमतकर बाद पछतयबा पर पछतयलौं हम।
डेग डेग गतिहीन होइत जीवन पथ पर छाँह हीन रौदे-रस्ते पछतयलौं हम।
ई तँ नहिं जे सब रहि गेल बाटे यात्राक आबि गेल संगहु जे किछु पछतयलौं हम।
खेद ककर जीवन मे रहइछ किछु ने किछु ककरो कम नहिं क' सकलौं पछतयलौं हम।
ऐ समाज मे रहि क' अनठीया न बुझाइ कय बेर तहू विफलता पर पछतयलौं हम।
मुठ्ठी हो,ढाकी-कोठी सब टा खाली भरल न देखल सबहक तें पछतयलौं हम।
निन्न पूर नहिं भेल राति सुतलौं नै गुंजन भोरे कोन उदासी पर पछतयलौं हम।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क। ५जून,२०२३.
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