💥 भाषाक प्रथम प्रहरी !
तथापि भाषाक प्रथम प्रहरी ओकर लेखके होइत छैक।तकरा बादे ओहि संस्कृत समाजक अन्यान्य अवयव। किन्तु जेना सब प्रकारक रक्षा हथियारे-औजार पर निर्भर नहिं छैक तहिना भाषाक अस्तित्व रक्षाक सेहो अपन-अपन परिसर,वाँछित आयाम ओ भूमिका होइत छैक। ताहि समस्त मे भाषाक प्रमुख प्रहरी लेखके किएक ? कारण जे शेष समाज मे सबदिन लेखकक आधार-अर्हता चेतना सँ समग्र स्वस्थ समृद्ध हयबे मानल जाइत रहल अछि। सैह लौकिक धारणा व्याप्त रहैत आबि रहल छैक। तकरा बाद भाषाक आयुर्दा पूराक पूरा लोकरुचि, लोक-जिह्वा पर टिकल रहैत छैक। से टिकल रहै ताहू मे सर्वाधिक प्रखर भूमिका लेखक- समूहेक होइछ।
कखनो काल हमरा तँ लगैए जेना समाज व्यवस्थे जकाँ भाषाक परिसर सेहो एकर मध्य वर्गे सँ ढुलमुल ओ आक्रान्त रहैए। तुच्छ मूल्य राजनैतिक बौद्धिक वर्गक लोक अपन निजी तात्कालिक वर्चस्व लेल भाषाक लोक संवेदनाक दोहन क' लैए-'इस्तेमाल' करैए। विडंबना ई जे ताहि मे भने किछुए परन्तु साहित्यक तुच्छ महत्वाकांँक्षी, छद्म लेखको बड़ बुधियारी सँ मिज्झर भेल,सम्मिलित रहैत छथि।
एहना वातावरण मे प्रतिबद्ध लेखक सब एकसर रहि जाइत अछि तथा समकालीन चालू राजनीति निश्चिन्त भाव सँ एकर लाभ उठा लैत अछि।
ध्यान दियै तँ बुझायत जे ओहि भाषा वा क्षेत्रक राजनीति केँ सर्वथा केन्द्रीय राजनीतिके सत्ता संचालित नहिं करैत छैक। अपन-अपन स्थानीयता संचारित करैत छैक जकरा तुच्छ आ नैतिकता विहीन नेतृत्व अपना पक्ष मे भजा लैत छैक। साधारण लोक संसद वा विधान सभा मे कोनो विधायक सांसदक "मैथिली मे शपथ ग्रहण'' करबाक नाटकीय घटनाक एहि व्यवहारक अर्थ समय रहैत बूझि नहिं पबैत छैक। आ एतबे मात्र सँ पाँचम बर्खी धरि लेल आकण्ठ तृप्त भ' बैसि जाइत अछि।
प्रायः सुविख्यात राजनीतिक चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया जी कहने छथिन जे :
" ज़िन्दा क़ौमे पाँच वर्ष तक इन्तज़ार नहीं किया करती हैं।''
इति,
#उचितवक्ताडेस्क। गंगेश गुंजन,१०जून,२०२३.
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