❄️ सुन्नर-सुन्नर हाथ !
चिपड़ी पाथैत काल ओहने सुन्नर नहिं रहै छैक-सुन्नर सुन्नर हाथ !
केहने दन मलिन भ' जाइ छै-यावत काल
केहुनी सँ ल' दसो आंँगुर धरि नीक जकाँ धोआ नहिं जाइ छै।
मुदा तैयो,ई नहिं जे
पंँजा सँ धोआ क' गोबर
स्वच्छ भ' जाइत छै-गफ्फा एकदम साफ़।
टल्हा वा चानीक अंँगुठीक ग'ह मे कतहु रहिए जाइ छै सटल-
कनिको गोबर।
भरि गाम सबजना पोखरि इनार रहैत छलै,
गोइठा पाड़ैत कोनो सुन्नर हाथ
ऐल-फैल सँ मोन मोताबिक धोआ जाइत रहै।
शान्त दुपहरियाक घाट पर
एम्हर-ओम्हर देखैत दुरगमनियांँ बेटी
भरि डाँड़ पानि मे पैसि मलिये लैत छल नुका क' अपन दुनू छाती सलज्ज साहस ओ साकांँक्ष,
भीजल आँचर सँ
निर्भय !
शोणिते शोनिताम करैत बाघ-सिंहक बर्छी-भाला वला धपाएल एतेक रास
पुरुषक ख़ूनी पंजा आ न'ह कहाँ रहैक ।
💥
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क। २६जनवरी,२०२३.
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