किछु ने किछु प्रत्याशा मे लोक जीबैए आशा मे।
किछु अपनो समयक किछु दोष बेसी लोक निराशा मे।
साधारण जन सोझ बुझथि पण्डित जन परिभाषा मे।
स'ब पराजय नहिं एक रंग तैयो मनुख दुराशा मे।
सबकिछु मे सबकिछु नहिं होइछ व्यर्थक बोध हताशा मे।
ज’लक नहिं पीयक हो दाम यात्रा कथिक पिपासा मे।
आजुक राजनीति अभिमंच जारी अछि तमाशा मे।
जेंँ मनुष्य हम देह,मने जीयब न'व अभिलाषा मे।•••
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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