डरा हुआ सच ही फ़रार है झूठ हर जगह बरक़रार है।
लिपटा है अवसर का बिस्तर दे धोखा कब से त’यार है।
जन साधारण को समझाने। तर्क पास में बेशुमार है।
बॉल्कनी के गमले सूखे पॉर्कों में पसरी बहार है।
मस्तमना हैं सोच सियासी दुश्मन दल का बंँटाढार है।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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