🌳 लोक तखन ने लोक-चर्चा !
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रचना तखन ने आलोचना।
आब तंँ कय काल,रचना अपने प्रश्न सँ घेराएल (संदेहक घेरा मे पड़ल) बुझा रहल अछि। आलोचना तंँ कनी अओर पहिनहिं आबि गेल रहय।
स्वादक साहित्य-विमर्श तँ चलैत रहैत छैक। तखन ?
ऐ दुनूक भविष्य ?
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[प्रो०भीमनाथ झा जीक एक फेबु टिप्पणी पर हुनके सम्बोधित हमर ई जिज्ञासा।]
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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