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विद्यापति आ रवीन्द्र जी
कवि विद्यापतिक काव्य मे 'साधारण लोक' कोनो विशिष्ट लैण्डस्केप मे आबि गेल लग- पासक वृक्ष वनस्पति जकाँ भेटत। जे कि रवीन्द्र जीक अधिकाँश गीत सभ मे सामान्य जन कोनो विशिष्ट लैण्डस्केप मे केन्द्रीय प्रकृति परिदृश्य रूप मे अछि। हमरा जनैत दुहू कविक लक्षित सम्बोधित पाठक श्रोता वर्ग काव्य बोधक स्तर पर सर्वथा पृथक्-पृथक् देखाइछ। विद्यापति आ रवीन्द्रक लोकप्रियताक यथार्थ इतिहास, काल समाज ओ अपन अपन सामयिकताक स्थूल विवेचना मात्र हयत। कविताक समग्र आकलन-मूल्यांँकन मे ई तत्व बहुत महत्वपूर्ण नहिं।
कोनो विशेषज्ञ वा वक्ता द्वारा रवीन्द्र जी कें विद्यापतिक काव्य परम्परा मे देखब-परेखब हमरा जनैत,रवीन्द्र जी कें विशेष करबाक उदात्त आशय रहितहुँ हिनक काव्य कें अपेक्षाकृत अवदात्त ओ अनादरे करब जकांँ हयत।अपन काव्य-गुण मे रवीन्द्र जी विद्यापति सँ फराके राखि क' मूल्यांकित करबा योग्य समकालीन मैथिलीक एकसर एतेक उल्लेखनीय आ लोकप्रिय कवि छथि।
स्मरण !
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क। १९.०५.'२०२२
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