❄️
हमर साहित्य : रैनबसेरा !
••
बनय तंँ हमर साहित्य कोनो रैन बसेरा बनय।सरकारी नहिं,लोक-न्यासी रैन बसेरा। कोनो राजधानी, अट्टालिका नहिं। धर्मशाला पर्यंत नहिं।
•
एक टा दुपँतिया
दिन दुपहरिया जेना कि भरिया भार उघैत रहैए
तहिना सूर्य बेचारा इ संसार चलबैत रहैए।
🌈🌈
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें