लेखक कलाकार आ समाज

❄️।                                                              लेखक कलाकार आ समाज
एक बयस पर आबि क' ओना तँ मनुष्य मात्र कें किन्तु सर्जक मन लोक कें तँ अओर सम्मान आ पुरस्कार सँ बेसी परिचर्चा ओ देख-रेखक ज़रूरति होइत छैक।
    शेष पाठक-लेखक समाज यदि हृदय सँ चाहथि तँ कय टा लेखक-कवि- कलाकार जे उपेक्षा आ एकान्त मे मरि जाइत छथि तनिका एक हद तक बचाओल जा सकैए। असाध्य रोगहुक लोक कें किछु आओर समय धरि अवश्य।
    यदि लेखक समाजक धरोहरि तँ ओकर संरक्षणक उत्तरदायित्व ओकर सन्ताने टा पर किएक ? समाजो पर किएक नहिं।
   आदरणीय रवीन्द्र जी कें सेहो आओर किछु बर्ष मास बचा क' राखल जा सकैत छल।
     अन्यहुँ हेतीह/ हेताह जे अपन सुपात्र सन्तान रहितहुँ जीवन एकसरपन मे
बिता रहल होइथ। आजुक भागाभागीक जीवन में कतिपय अपरिहार्य व्यावहारिक कारण छैक जकर दबाब मे कतोक योग्य सन्तान सेहो अपन माय-पिताक देख रेख निरन्तर तत्परता सँ नहिं क' पबैत छथि। समाज सहयोग करनि तँ ओहन व्यक्तित्वक सम्मान पूर्वक परिचर्चा कयल जा सकैए। साहित्य,संस्था वा समाजक कोनो एकाइ क्रमशः हुनका सँ भेंट-घाँट करैत,निरन्तर सम्पर्क मे रहैत कुशल क्षेम पुछैत हुनक शेष आयु कें सार्थकताक बोध करा क' हुनक एकान्तक हताशा आ उदासीनता कें दूर क' सकैए।
उदाहरणार्थ सौभाग्य सँ एक टा एहन वरेण्य गौरव एखन मैथिली मे ज्वलंत जीवन्त छथि पटना मे पण्डित गोविन्द बाबू।
सब के विश्वास पूर्वक बूझल छैक जे सुपुत्र नाटक लेखक अरविन्द कुमार 'अक्कू' समेत सभ सन्तान हुनका सम्मान पूर्वक देखि रहल छनि। तें कि १०१ वर्षक हमरा लोकनिक गोविंद बाबूक जे मैथिलीक उपस्थित गौरव छथि आओर जे सम्प्रति प्रायः समकालीन कोनहुंँ भारतीय भाषा कें एहन सौभाग्य नहिं छैक, तनिकर चिन्ता खाली अक्कुएक रहनि ? किएक
स्थानीय साहित्य रसिक,संस्था लोक यदि अपन अपन स्तर पर तय क उत्तर दायित्व ल' लेथि जे नियमित हुनकर हाल चाल पूछल करनि तँ गोविन्द बाबूक जीवन रस जे मात्र परिवार आ सन्तान मे केन्द्रित छनि से अपन सामाजिक प्रयोजन बोध सँ जुटि क हुनक आयुर्दा बढ़ा सकैत छनि। से ज़िम्मेदारी लेब' पड़तै। लोक,समाज,संस्था कें।
सरकार के एकर कोनो बेगर्ता नहिं रहैत छैक। कहियो नहिं रहलै। मुदा जकरा कहैत छिऐ- अपन समाज अपन मैथिल संस्कृति से तँ अछि। से की छुच्छे गौरवान्वित होइत रहै लेल अछि कि किछु व्यवहारो मे ? देखबैयो लेल ?
   मैथिली अपन एहन नव उपक्रम क' एक टा विशेष पहल करबाक इतिहास रचि सकैए।
सोचि सकैत छी। हमरा लोकनि क' सकैत छी।
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  नोट:
(विषय हम २०.०५.'२२. क’ लिखने रही।आइ देखा गेल।स्मरण नहिं जे प्रकाशित अयलिऐ किरहिए गेल रहय।तें एकरा कृपया एही रूपें पढ़ल जाय।)
                      ।🌼।                                              गंगेश गुंजन 
             #उचितवक्ताडेस्क।

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