।। मैथिलीक चिन्ता आ किछु लोक ।।
अत्यंत रोचक बात अछिजे खाली मैथिली ताहू मे साहित्यिके समाज टा मे ई प्रवृत्ति व्याप्त अछि जे कोनहुँ लेखक विशेष कें अपने लेखन भाषाक पूरा साहित्येक प्रतिनिधि उदाहरण भ’ गेल बुझाय लगैत छनि। तें ओ विशेष अपन साधारणहुँ रचनाक उचितो आलोचना केँ समस्त मैथिली साहित्य आ साहित्यकारेक निन्दा आ तिरस्कार मानि क’ क्षुब्ध दुखी होइत रहैत छथि।भाषा प्रेमक व्याकुलता मे हुनका बुतें ई बात पूरा प्रचारितो कयना जाइ छनि। आन्दोलन उठा देबाक सीमा धरि चलि जा सकैत छथि। यद्यपि एहन समर्पित लोकक मैथिली प्रेम पर कथमपि संदेह नहिं कयल जा सकैए। सम्मान्य छथि।
तथापि,
सीमित मान्यता आ अनियंत्रित
भावुकताक एहन प्रवृत्ति सँ मैथिली के विशेष साँघातिक हानि होइत छैक।हमरा लोकनिक ध्यान जयबाक चाही जे सुमन,मधुप, हरिमोहन,मणिपद्म आ यात्री पर्यंत एकसरे समस्त मैथिली नहिं भ’ सकैत छथि। उपर्युक्त सभटा आदरणीयक देह पर आलोचनाक चाँछ सब पड़ल छनि।भनें किनको कम किनको बेसी गँहीर।मुदा सभक देह चँछाएल छनि। •
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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