🌿 गाछ स्त्री !
रस्ता कातक आमक गाछ
छथि-स्त्री।
टिकुला होइतहिं ढेपा-झटहा
मारि-मारि क' तोड़' लगैत छनि,
अगत्ती-अबण्ड छौंड़ा सब,
अबैत-जाइत बटोही।
डम्हको होयबा संँ पहिनहिं सुड्डाह
क' दैत छनि बसन्त, स'ब ऋतु !
विकट व्यवस्थाक समाज,
केहने दन लोक !
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गंगेश गुंजन #उ.व.
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