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ज्ञान कें अपना हृदय नहिं होइत छैक। मस्तिष्क होइत छैक। सहृदय भेला पर ज्ञान मनुष्य भ’ जाइए।मनुष्य नीक अधलाह सब प्रकृतिक होइअय। 🌳 गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क.
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