बात कोनो बातक होइत छैक !

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बात कोनो बातक होइत छैक। जेठजन लोकनि सर्वथा तार्किके रहैत छथि ? अतार्किक एकहु गोटय नहिं ? परिवर्तन तँ मनुष्य केंँ प्रकृतिक उपहार थिकै। तकरा एना भ' क’ नकारात्मक हयब कोना उचित। चाहे मिथिले समाज किएक ने।
   प्रगतिशीलता समान परिवर्तनक सतत प्राकृतिक आवश्यकता कें अपने विशेष प्रबुद्ध लोकनि एना भ' क' सरलीकृत अधहपतनी आ तुच्छ नहि बनबै जैयौ महराज। कृपया।
  हमहूँ ओही पुरना समयक छी। हमहूँ जेठ लोकनिक सोझाँ मूड़ी निबाइए क' रहल छी। किन्तु ई नहिं बिसरि सकैत छी जे कय काल जेठो पीढ़ीक अतार्किक बात-विचार सुनि छुच्छ शिष्टाचारक नाम पर मूढ़ता पूर्वक चुप रहि जाइत रही।आजुक पीढ़ी अनावश्यक भद्र मनुष्यता मे पड़ि क' अतार्किता केँ नहिं मानैए।भने ओ कोनो जेठोजनक हो। नव तूर प्रतिवाद करैए। तर्क छैक तँ कोन बेजाय? हँ भाषा असंयत आ अमर्यादित हो तँ ओकर समर्थक हमहूँ नहिं छी। परन्तु बालिक अछि,ओ पूछत। व्यवहार अनटोटल नहिं छैक तँ स्थिति- औचित्यक आकलन मे ओकरो हस्तक्षेपक मोजर किएक नहिं हो ?
आब युवक तँ छोड़ू, वयस्को लोक कतेक भेटताह जे यात्रा कालमे भदबा-अधपहरा
मानैत छथि ?
पत्रा पञ्चांग तँ नहिं उठि गेल। दिन,तिथि आ पहर सेहो। सब तँ चलिए रहल अछि।
                  🌺  🌺। 🌺।                                         गंगेश गुंजन 
                #उचितवक्ताडेस्क। 

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