लिखितौं तँ आइ...

🔥        लिखितहुँ तँ आइ…

 लिखितहुँ तँ आइ हम सब संँ पहिने,
माटि लिखितहुँ
तकर बाद अन्न कोनो- धान
दड़िमी,हरिनकेर सँ बहरनी धरि 
कमला धार,तकरा बाद, 
पुबारि बाध बान्ह पर बहैत बसात, 
दुपहरियाक मन्हुआएल सूर्यक रौद आ चिड़ै चुनमुन्नीक बोली लिखि क'
गाछ वृक्ष,लता वनस्पतिक हरिअरी लिखितहुँ।
चरा क' बकरीक हेंज हँकैत गाम घुरैत
हाथ मे छौंकी लेने काँख तर तीसराक पोथी बर्ख बारहेक छौंड़ी समीना
लिखितहुंँ।
महीँस चरा क' बाध सँ घुरैत 
मैल,फाटल चिटल वस्त्र मे उतरवरि टोलक रमकन्ता छौंड़ाक जड़काला, 
साँझ लिखितौं।

बहुत प्रयासो क' क' तथापि 
नहिं लीखि सकितौं कोनो सुन्दर फूल-
गेना कि गुलाब,एत' धरि जे अढ़ूल…

 कोन कोन धरानियें,एतनी एतनी क' जोगाओल खुहरी-गोबर कर्सीक
कनिको काल लय सुनगल घूर लिखितहुँ 
तकर धूआँ आ पजरि क' अन्हार मे ऊठल धधरा लिखतहुँ..
                             °°
                      गंगेश गुंजन,
             #उचितवक्ताडे.०१.०१.'२३.

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