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राजा कें कहऽब नहि अयलै
परजा कें सुनऽब नहिं अयलै
लोकतंत्र केँ बनब नहि अयलै
तँ जनता केँ रऽहब नहि अयलै।
दु:ख केँ बहुत सऽहब नहिं अयलै
सब मनुष्य कें ढऽहब नहिं अयलै
धार केँ तोड़ब नहिं बिसरलै
नदीक बाढ़ि भ’ बहब नहिं छुटलै।
कवि लोकक कऽहब नहि रुकलै
यावत मनक संसार नहिं भेलै
कतहु एक ठाम डेग न थम्हलै
चलिते रहलै
चलिते रहतै।
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गंगेश गुंजन,३० जुलाई,’२४.
#उचितवक्ताडेस्क।
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