अचार जकाँ, पथार जकाँ नहिं ...

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         लेखकक जीवन मे प्रायः एक समय अबिते छैक जखन ओ अपन जवान रचना-काल कें वर्तमान आँगनक कड़ाचूर रौद मे अचार जकाँ सुखबैत रहैए।अचार जकाँ,धान कि गहुंँमक पथार जकाँ नहिं।
  कय गोटय थैर पर बान्हल बूढ़ गाय- बड़द जकांँ बैसल,से स्मृति पाउज करैत सेहो...
   😁|।                🌼               ।|😁
                      गंगेश गुंजन 
                    #उचितवक्ताडे.

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