🛖⛺ ई जे फेसबुक दलान अछि...
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फेसबुक पर देल जे म'न धरि पहुँचय तकरे ऊपर टा किछु बाजी तंँ ओ बाजब बुझाइत छैक। दोस्तियारी कि सौजनियाँ निबाहै मे ई सोचि क' जे 'हिनका पोस्ट पर किछु नहिं लिखबनि तं की सोचताह वा सोचतीह,खराब ने लगनि इत्यादि भावनात्मक दबाब मे बलधकेल किछु कहबे करब उचित नहिं। तेहन 'क'हबो' 'बाजब' नहिं, 'भूकब' लगैत छैक।ई हमरा सब बूझि ली।ई वितृष्णाक अपन भाव व्यर्थक मैथिलाम मे भने लोक अहाँ के क'हय नहिं। किन्तु यथार्थ आ स्वाभाविक छैक। निंहेसो सन पोस्ट पर यदि तेहन हरियर आ समावेशी प्रतिक्रिया लिखबै तं शेष सब जे टिप्पणीकर्ताक संबंधी नहिं तिनका अप्रिय लगबे करतनि। फेसबुक निजी तं होइछ परन्तु एकर उपयोगक आयाम निजता सं बाहर 'व्यापक समाज' छैक। फेबु.पर हमरा लोकनि सब हरदम नीके नीक नहिं लिखै पढ़ैत छी। तें कोनो पोस्टक प्रतिक्रिया जन्य उदासीनता के
सहज स्वीकार करैत चलबाक चाही। निराशा वा पाठकीय उपेक्षा रूप महसूस नहिं करबाक चाही।
ई कहब आवश्यक अछि जे हम अपन यैह व्यवहार आ निर्वाहक अभ्यास रखने छी।
फेसबुक पर यदि परस्परक व्यवहार मे ई स्नेह - संयम, निस्संगता आ निष्पक्षता निबाहल जाय तँ फेसबुक आधुनिक जीवन- यापन-व्यवस्थाक सर्वोत्तम परिवार आ आश्रम लागत।
वर्तमान तथा अबै वला मनुष्यक अओर कठिन असह्य समयक लेल 'फेसबुक दलान'केँ बचा क' राखब अनिवार्य अछि।
गंगेश गुंजन#उचितवक्ताडेस्क।
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