📕🛖
सम्बन्ध : एक टा लालटेन-डिबिया
▪️
सम्बन्धो अपन अपन संदर्भ मे व्यक्ति व्यक्तिक परस्परक निहित अधिकार होइत छैक। ताहि अधिकारक प्रयोग नहि कयने कुरहरि-कोदारि -हाँसू-चक्कू जकाँ सम्बन्धो मे सेहो बीझ लागि जाइत छैक।से अधिकार- बोधक बांँचब वा सुखाएब लोकक अपन संस्कार आ विवेक पर निर्भर रहैत छैक।सेहो तँ बेसीतर व्यक्ति विशेषक संस्कार,निजताक गर्वबोध अतः अहंकार संँ संचालित होइत रहैत छैक।संगहि परस्पर हीनता आ श्रेष्ठताक ग्रंथि(मानसिक व्याधि) संँ अनुशासित होअ’ लगैत छैक।
सम्वेदना-सहानुभूतिक पारस्परिक आदान -प्रदानक व्यवहार कम होइत होइत जखनहि एकदम ठप्प भ’ जाइत छैक तखनहि लालटेनमे तेल समाप्त भ’ गेलाक बाद बाती सुखाक’ लालटेन जकाँ फकफका क’ मिझा जाइत छैक।
ताइदिन बूढ़ पुरान सबक सन्ध्याकालीन प्रायः दैनिक संध्या संवाद रहनि- ‘सुनैना दाइ,लालटेन डिबिया क’ लिअ’। अर्थात् देखि लियौ कल्हुका मटिया तेल बांँचल छैक कि नहिं? बत्तीक ममड़ी झारि क’ शीशाक करिखा साफ क’ दिऔक।’
सांँझ बातीक व्योंत क’ लिअ’।
हमर छोटका भैया बड़ दृढ़ स्वरें कहथिन :
अधिकार नहिं छोड़ी। नीक लोक सम्बधीकक अधिकार के ओकरा उपर 'कृपा करब' बुझबाक बेकूफी नहिं करैत छथि। 🛖
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें