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यौ प्रियवर प्रवासी भारतीय मैथिल लोकनि !
हमरा लोकनि सब गोटय अपन-अपन गामक ऋणी छी।ई नै बिसरबाक चाही।अर्थात् अपना सबहक ऊपर ‘गामक ऋण’ अछि।शास्त्र की कहैत छथि से तँ नहिं कहब परन्तु हमरा जनैत जहिना ‘मातृ-पितृ ऋण’ होइत छैक तहिना ‘ग्राम ऋण’ सेहो होइतहिं हेतैक। तेँ जीवन मे सब केँ ग्राम ऋण सँ सेहो ‘उऋण’ होअ’ पड़ैत छैक।
विदेश कमा-कमा क’ कतोक गामक कतोक व्यक्ति अपना देशक विकास आ प्रगति मे अपूर्व योगदान क’ रहल छथि। बहुत नीक काज। तकर प्रशंसा अवश्ये होयबाक चाही। होइतहुँ छनि। किन्तु हमरा मन मे ई प्रश्न उठ’लय जे एहन महानुभाव एन आर आई लोकनि जे छथि से यदि प्रगति सँ एखनहुँ वंचित अपना गामहुँक ध्यान राखथि जे गाम संसारक सब सुख सुविधा संँ एखनहुँ वंचित छनि । एकहि ठाम ठमकल छनि। अपना ताही गामक सामाजिक नव निर्माण मे किछुओ क’ सहयोग करबाक भावना करथि तंँ शीघ्रहि मिथिलाक सब गामक नसीब बदलि सकैत छैक।विशेषतः सब गाम मे बदहाल,बेर्बाद पड़ल,भथल इनार-पोखरि सन अनमोल उपयोगी सामाजिक,सामूहिक संसाधन सबहक यदि फेर सँ उद्धार करबाक म’न बनबथि तँ हमरा विश्वास अछि जे देर-सबेर सब गामक काया पलट भइए’ क’ रहतैक।
प्रियवर प्रवासी भारतीय मैथिल लोकनि ! अपन सुख-सपना मे अपन गामो कें शामिल करैत जाउ ! यतबे सम्भव हो,किन्तु से,हो !
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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