💢। जमेरी नेबो आ हवाइ जहाज
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ओना स्वप्न तंं स्वप्ने होइत अछि किन्तु हम जे आइ भोरवा मे देखलौंहें से अद्भुत।
देखै छी जे एक टा खूब पैघ टटका जमेरी नेबो नोरे झोरे कानि रहलय!’
माया भ’ गेल। पुछलिऐ जे-
‘की भेलौए ?तों एना कानि किए रहल छें ?’
‘हवाइ जहाज पर हमहूंँ दिल्ली जाएब! ’
‘चल। कोन हर्ज? तोहर कि कोनो टिकट कटब ‘ पड़त? कतहु सन्हिया क’ बैसि जो।’
‘बाकस मना करैए।पूरा ओजन भरि गेलौंहें।’
जमेरी नेबो हिचुकि हिचुकि क’ अपन लाचारी कहलक। स्वाभाविके छल मन द्रवित भ’ गेल। किन्तु बक्सा कें हम कोना कहितिऐक जे एकरा ल’ लहीक?
हवाइ जहाज़ सँ आबाजाहीक ई न’व
सुभीतावादी मैथिल स्वभाव दुआरे आब बहुत जल्दीए गाम-नगरक सम्बन्ध अओर नीरस आ उसठ्ठ भ’ जाएत। सावधान।
जनिका जमेरी नेबो गाछ छन्हिहों सेहो सब यात्राक पन्द्रह किलो ओजन बस्तु जातक सीमा मे रहै लय कोनो खेप गाम सं दसो टा जमेरी ल’क’ दिल्ली कि यत’ कतहुं कर्मस्थली शहर छनि नहिं ल’जा रहला / रहलीहय।ओल ल’ जेबाक कथाक तँ चर्चो नहिं हो।
बिना जमेरिए ओल हुअय ?
यत’ रहैत छी,भने अनदेसीए (भ्रम नहिं हो।ई अनदेसी मैथिली भाषा व्यवहारक देसी थीक। देशक लोकतंत्रक नहिं।)ओल भेटि तँ जाइए ने ?
एखन तँ दरभंगे टा अछि आब जल्दीए मधुबनी हवाइ अड्डा सेहो तैयार भ’ चालू भ’ जाएत ! तकर बाद तंँ आर…
पुनश्च:
आ हँ,हमर ऐ पोस्ट कें कोनो एक जीहलाह मैथिलक ‘जमेरी नेबो आ ओल’ धरिक समस्या धरि मे सीमित नै बूझै जाएब। कृपया,
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क.
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