गीत आ ग़ज़ल मे भेद

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              'गीत आ ग़ज़ल मे की भेद ?'
              'गीत भेल शर्बत आ ग़ज़ल, शराब!'
(३१.१.’२६.मिथिला सृजन । संदर्भ गीत ग़ज़ल पर हमर विनोदी पोस्ट)
    ख़ूब बढ़िया रमेश।ऐ पोस्टकें यतवा चर्चेय  बनाओल गेलै तै आशय सँ त हम कयनहि नहिं रहिऐ 😃।
    विशेष रोचक तंँ ई जे ताहि मे अहूँ शामिल भ' गेल बुझयलौं । बकौल दुष्यंत कुमार जी-....गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं 'क परि भ' गेलै।आब देखू जे मात्र एक टा छोट छिन ‘ललित विनोद’ प्रसंगक एहन महत्वहीन पोस्ट अहाँ सँ एतेक विचार विमर्श भरल आ विस्तृत प्रतिक्रिया लिखबा लेलक !सेहो एतबा मनोयोग पूर्वक। जखन कि हमर मूल पोस्ट मे अहाँ के ‘विमर्श’क कतहु कोनो प्रस्ताव अभरल? पुरना स्कूलक छी हम 😃। खैर,
    …आन प्रतिक्रिया छोड़ियो दी तँ खुद अहूँ विमर्श बना देलिऐकय।असल बात जे ऐ पोस्टक रक़बे अत्यंत सीमित छैक। ध्यान दिऔ सब सं निच्चांक हमर ऐ अत्यावश्यक सूचना पर- 
साहित्यक नव-नव संसर्गक हल्लुक फुल्लूक गपशप।दू टा गीत ग़ज़ल नव प्रशिक्षुक अंतरंग वार्ता।  😁
      हम तंँ छोटछिन तंबुक तनने रहिऐ।अहाँक संकेत जे 
शामियाना किएक नहिं तनलिऐ।आब ई तंँ कवि (हमरा) पर सद्य: अन्याये भेल ने😃। हमरा यतबे उपाय रहत ततबे ने करबै। ब्यौंत पाँच टा नोथारी भोजनक रहत आ नोंति देबै सौंसे गाम ? ई कोनो व्यवस्थित लोकक बात होइतैक।
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   दिलचस्प तथा अत्यन्त गहींर अतः अतिरिक्त सार्थक बात ई भेलै जे हमर एहि विनोद वार्ता केँ ‘सरस जी’’ (सियाराम झा जी ‘सरस’) वैचारिकीय संज्ञान लैत अपन मन्तव्य ओ सैद्धान्तिकी प्रतिक्रिया लिखि क’ हमरो चेतौलनिहें 
     पढ़ै जाइ जाउ ! स्वागत.
“… विनोदक संग -संग "कालो गच्छति धीमताम" वला बात सेहो भने-नीकें आयल अछि एहि मनमौजीपना में। जैं कि प्रसंगवश हमरो नाम आयल अछि,वार्ताक्रम में,तैं दुस्साहस कर रहल छी।                                    
(१) गीत समस्त भारतीय साहित्यक अति प्राचीन कालहि सं अंग (प्राण तत्वे सन)रहल अछि।ताहि दॄष्टिएं गजल हाल-हासिली विधा छी कविताक।                                  (२) भांति-भांतिक गीत,गीतिका,गाथा एवं छंद -विधान गीतक आकाश कें असाधारण विस्तार देलक अछि। अनेकहु मनीषी लोकनि युग-युगाति सं अपन -अपन क्षमता आ मेधा सं एकरा पुष्ट-बलिष्ट बनबैत अएलाह अछि। तेना गजलक विषय मे तथ्य नहि अछि।मैथिली में ल' द' क' पं.सुन्दर झा शास्त्री (नाटक -सुंदर संयोग/१९०६ ई.)लग सं गजलक इतिहास देखि पबैत छी।                    
(३) गीत आ गजल दुनू गेयधर्मिताक गुण रखैत अछि।तैं हमर कहनाम जे दुनू मे मात्रा आ ध्वनि शास्त्र सहयोगी बनैत अछि ।                                   
(४) जतय एहि दुनू काव्य विधाक पाठ केर प्रश्न अबैछ, ततय दुनू समान रूपें निम्मन तरहें सभा-सोसाइटी मे पढ़ल जाइत अछि।ताहि धरातल पर पढ़बाकाल दुनू मे यति-गति-मति केर प्रयोग होइत अछि।                           
(५) गीत आ गजल दुनूक गड़हनि के सांचा भिन्न भिन्न होइछ।गजलक मादे एकरा बहर वा 'मीटर' कहल जाइछ। ई बहर कैकटा अछि,कहब कठिन अछि। हं,मुदा बड़-बड़ गजलगो लोकनि प्रायः १९--२० मीटर धरि सीमित रहलाह अछि; प्रायः ‘फैज’ सहित। गीतक मादे एहेन सीमावद्धता कतहु नै ठहरैए। गीत तं ८०- -१०० तरहक सांचा ( फ्रेम)में हम स्वयं रचने छी आ प्रस्तुतियो करैत रहल छी।     
(६) हं,रचना प्रक्रिया दुनू विधा मे गंभीरताक अपेक्षा रखैत छैक।जैं कि गजल साकी शराब आ प्यालाक बस्ती सं आयल अछि,तैं एहि मे नाज-नखरा, तात्कालिक मस्ती ओ लचक, महफ़िली-मौसिकी इत्यादिक आधिक्य देखना जाइछ। ओना,इहो एकटा वास्तविकता छी जे आजुक समय मे गीत-गजल दुनूक कथन-भंगिमा में क्रांतिकारी परिवर्तन आयल अछि।दुनू अपना कें पुनर्नवा कयलक अछि। गजलक सैह तेबर कतौ-कतौ गीत पर भारी पड़ैत देखना जाइछ। मुदा तैखन दोसर ठाम गजलक माथ पर गीतहु कें उमकैत देखि सकैत छी। ताहि लेल कविक निजी मेधा-प्रतिभा आ स्वाध्याय सेहो उत्तरदायी होइछ।                           (७) ई हमर नितांत निजी मंतव्य छी जे  गीत विधा कें जहिना प्रेम-रस आ करुण रस शिखर पर लए पहुंचाबै छैक,तहिना गजल कें प्रेम आ राजनीति-रस बेसी रुचै- पचै छै तथा उच्चता प्रदान करैत छैक।’
(क्षमायाचना सहित आजुक लेल एतबहि।                        
                -सियाराम झा ‘सरस’.
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अहाँक बेस विवेचन। ख़ूब सरस जी। 
ऐ पोस्टक भूमि मात्र क्षण भरि हल्लुक-फुल्लूक अपन मैथिल-विनोद भरि रखने रहिऐक। 😃।
    ख़ास क’ तरल भाषा मे कहबाक शर्त आ हमर चर्चाक अंतिम पैराक अंतिम वाक्य ‘ दुनू गोटे कें आवेशो बहुत छनि एकर’ अहाँ बड़ दिब वैचारिकीओ सं जोड़ि देलिऐ।
धन्यवाद। सस्नेह,
                        🌻 
                  गंगेश गुंजन 
              #उचितवक्ताडेस्क।

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