संदेश

माय-बाप : एक रती भेद !

कोदारि,पोखरि ओ समुद्र !

विदा ! प्रो कमलकान्त झा जी

प्रेम

मैथिलीक भनसाघर मे

...ओकर जन्म भेलो छैक वा नहिं?

।📕। भाषाप्रेम,भाषाभिमान आ भाषाप्रेम,भाषाभिमान आ भाषा- आन्दोलन तीनू सर्वथा तीन प्रकृति आ मनोभूमिक सामाजिक-यथार्थ थीक। तीनू मे तीनू तत्व हएब तँ किंचित संभव छैक किन्तु तीनू केँ मिज्झर क’ ओकरा एकहि मानब तँ हमरा बुझने ओहने सन गप भेल जेना पढ़ौनिहार जे शिक्षक सैह स्कूल भवनो बनाबथि,ओइ मे लागल ज’न मिस्त्री लय पनिपिआइक रोटी सेहो पकबथि आ अढ़िया तराजू ल’ क’ बोनि सेहो जोखथि। वर्तमान मैथिली भाषान्दोलनक कदाचित यैह दुविधा छैक जे एतेक समय,कतिपय समर्पितो लोक आ प्रयास होयबाक बादहु बहुत उत्साहवर्धक सांगठनिक दृश्य नहिं देखाइ छैक। गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क.

कविता आवारा !

मातृभाषा प्रेमीक वाक् द्वन्द्व

टिप्पणी : व्याकरणक कविता...

दू पँतिया : पहिने ख़ूब विचारी बात...

ग़ज़लनुमा : जज़्बात भुनाते हो । ‍ ‌‌

ग़ज़ल बन : किछु तँ भेलैए ककरो

ज्ञान के अपन हृदय नहिं छैक

गाछ स्त्री !

दू पँतिया :

मातृ दिवस : कैलेण्डर !

दू पँतिया : यात्राकेर अंतमे दोस्त कहि क

प र थ न

दू पँतिया : किछु लोक अपन सब दिन...